शनिवार, 1 नवंबर 2008

नेता बन सार्थक किजीए .........

सारी दुनिया की बात करते हो
जरा देश की जनता को देखिये
नेताओ को अपना देवता जो मान
पूज रही जनता को देखिये
चुनाव में जो अपना मत देंगे
सत्ता में जो कुर्सी देंगे
ऐसी जनता के हित तो जरा सोचिये
जनता का विश्वास तुम जीत लोगे
पद की गरिमा पर ध्यान अब दीजिय
देश का सम्मान हो तुम ,
जनता का विश्वास हो तुम
ऐसे जनता के विश्वास को
आज नई दिशा दीजिय
बहुत हो चुकी दगावाजी
अब जनता से खिलवाड़
दगाबाजी अब मत किजीए
झूटे वादे छोड़ जानते के
स्वाभिमान को तो पहचानिये
नेता हो तुम देश के हो कर्णधार
देश को नया आयाम अब दीजिय
जनता अब जिसलिए चुने तुम्हें
उसे नेता बन सार्थक किजीए

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2008

आज के नेता ,जी

बड़े नेता बने फिरते है ,चंद वादों के खातिर ये लोग
वक्त आने पर भाग उठते है, नेता बताने वाले ये लोग
इनका न कोई ईमान होता है न कोई होता है धर्म
वैसे नही कुछ पास तो लंबे चोड़े भाषण ठोकते है
बड़े नेता बने फिरते है.............
जाते है समस्या हल करने ,गाँव में ये लोग
कारों का तेल फूँक कर प्रदुषण फैलाते ये लोग
ये गाँव में समस्या मिटाने नही
अपनी झांकी दिखाने जाते है ये लोग
बड़े नेता बने फिरते है.............
चुनाव के पास आते ही दोरे शुरू कर देते है ये लोग
चुनाव जीतने के बाद सबकुछ भूल जाते है ये लोग
चुनाव हारने के बाद गली कूचों नजर आते है ये लोग
बड़े नेता बने फिरते है.............

सोमवार, 20 अक्टूबर 2008

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2008

एक निवेशक कि व्यथा .....


शेयर बाज़ार क्या गिरा हालत पस्त हो गई
लाचार बेबस और ज़िन्दगी बेकार हो गई
दिवाला ही निकल गया दीवाली से पहले
सपने हजारों देखे थे मार्केट में लगाने से पहले
सब कुछ काफूर हो गया सपनो की तरह
ग़म दे गया खुशियों की जगह
अब ज़िन्दगी भी खुशियों और ग़म के साए में
अब अहसास कराने लगी है तन्हाई के साए में
रोज मै टकटकी लगाए बिज़नस ख़बरों को देखता हूँ
जो कभी खुशी कभी ग़म का कराने लगी अहसास है
इसी अहसास में बंधने लगी छोटी सी आस है
बाज़ार की खामोशी अब सही नही जाती
दिवाली पर बिना पैसे लक्ष्मी भी रूठ जाती है
अब हालत ये है कि हर तरफ से टूट रहा हूँ
टूट कर अपने आप से भी रूठ रहा हूँ
अब तो लब भी मेरे खामोश हो गये
मर कर भी जी रहे हालत ये हो गये
दीवाली भी खडी है दहलीज पर
कैसे मनाओ खुशियाँ इस त्यौहार पर
बेटा भी करने लगा है आतिशबाजी की मांग
कपड़े मिठाई और बाइक है उसकी डिमांड
काश एक बार लक्ष्मी जी प्रशन्न हो जाए
बाज़ार के रोनक त्यौहार में बदल जाए

सोमवार, 29 सितंबर 2008

आतंकवाद...


जहां कही देखो नजर आता आतंकवाद है
सदियों से हम झेल रहे इस के शिकार है
हमने भी महाशक्ति के सामने प्रस्ताब था रखा
उसने न दिया ध्यान आतंकियों के हाथ में
हथियार को रखा
इक दिन अचानक यू धमाका हुआ
महाशक्ति राष्ट भी थर्रा गया
दो बहु मंजिला भवन मिटटी में मिला
नेस्तनाबूद हो गया
अब अपनी गलती का भी एहसास हो गया
अब तो आतंक का चारो ओर हो गया प्रभाव है
अब जहा कही देखो नजर आता आतंकवाद है.....
आतंक की पराकाष्ठा स्वयं के लिए दुःख दाई हो गई
कल की छोटी सी भूल आज अभिशाप हो गई।
इस दर्द से करह रहा है आज हर देश
क्योंकि बारूद के ढेर पर है बैठा हर देश
फटाको की तरह फूटते बम ओर बारूद हैं
दिवाली भी अब सुरक्षा के साये में
तिरंगा अब भी सुरक्षा की करता गुहार है।
अब जहा कही देखो नजर आता आतंकवाद है.....

अब राजनीति में आतंक भी मुद्दा बन रहा

कल तक था राम मन्दिर और परमाणु करार भी

आज कोई सुरक्षित नही है राजनीति की छांव में

सभी करते है राजनीति अपने बचाव में

नही किसी को मतलब अपने आवाम से

आतंकियों को पनाह मिल रही है कारागार में

सुरक्षा में मुस्तैद खड़े है सैनिक इनके बचाव में

कोर्ट में चल रही है पैरवी

किसी फैसले के इंतजार में

आतंकी कहर बरपाते जा रहे है

अपने अभियान में

धमाकों के नाम पर मरती आवाम हैं

नेता सुरक्षित और जनता बेहाल है

अब तो मर मर कर जी रहे हैं

क्योंकि हर जगह नज़र आता

आतंकवाद है.........

रविवार, 28 सितंबर 2008

तेरे संग मेरा भी नाम हो...

कूची जो कभी रंग बिरंगे रंगों में सनी
कल्पना की उडानो के तरंगो में बनी
कलाकार और चित्रकार के हांथों से लिपटी
जैसे कह रही हो तुम मुझे नया रूप दो
दो मुझे साकार रूप
कई इस कला के कद्रदान हो,
जुड़े तेरा नाम मेरे नाम के साथ
तेरे संग मेरा भी नाम हो

गुरुवार, 25 सितंबर 2008

शब्दों की माला ...

मन मै तरंगे उठती है
कुछ कह नही पाता
कहाँ क्या लिखू
कुछ नज़र नही आता
फ़िर भी लिख रहा हूँ
शब्दमाला में गुथ रहा हूँ
आज कर रहा हूँ
शब्दों को समार्पित
प्रतिसाद मिलेगा
इस भाव से मै
कर रहा हूँ अर्पित
इसलिए मै बहुत कुछ लिख रहा हूँ
शब्दों की माला को मै गुथ रहा हूँ