शनिवार, 23 जनवरी 2016

घटते जंगल और सिमटते ज्ञान से कम हुआ आदिवासी जनजाति में जड़ी-बूटियों का उपयोग

आदिवासी जनजातियों का सदियों से जंगल से गहरा रिश्ता रहा है। जंगल की हरी भरी गोद में रहकर उन्होंने पौधे और तमाम तरह की जड़ी बूटियों का व्याकरण सीखा और गढ़ा। जिसे वे आज भी स्थानीय स्तर पर औषधि के रूप में समुदाय के लोगों के इलाज करते हैं। आदिवासी जड़ी-बूटियों के इस्तेमाल से पहले इन्हें पूंजते हैं, ऐसी मान्यता है कि इससे जड़ी-बूटियों की असरकारक क्षमता दोगुनी हो जाती है। वहीं, इनकी जानकारी सार्वजनिक करने पर औषधि गुणों में कमी आ जाती है। आदिवासियों द्वारा एकत्र इन जड़ी-बूटियों और इनके बताए गए उपयोगों को आधुनिक विज्ञान भी तथ्यात्मक मानता है। इसी का परिणाम है कि आज जंगल की यह औषधि आदिवासियों के अलावा आम लोगों द्वारा भी उपचार में प्रयोग की जा रही है।

विदिशा जिले के गंजबासौदा विकासखंड में सुदूर जंगलों में रहने वाले बुजुर्ग सहरिया आदिवासी वन औषधियों के अच्छे जानकार हैं। उन्हें बरसों पुरानी जंगल आधारित परपंरा पूर्वजों से बिरासत में मिली है। जिसे वे आज तक आत्मसात किए हुए है। सहरियाओं की जड़ी बूटियों और उनकी संस्कृति से संबंधित किसी भी परपंरा का लिखित साहित्य मौजूद नहीं होने से यह आज भी बरसों से पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तातंरित होता आ रहा है, लेकिन वर्तमान में स्थिति यह है कि समुदाय की युवा पीढ़ी उपचार की इस परंपरागत पद्धति को लेकर गंभीर नहीं है।

विकासखंड के ग्राम खोंगरा मालूद के जंगल में उम्र की 75 बसंत गुजार चुके घासीराम सहरिया वनोषधियों के जानकार है। वे बताते है कि इससे पहले आशाखेड़ी, लेटनी (तहसील कुरवाई ) के वन क्षेत्र में हम रहते थे। माता-पिता के अलावा परिवार में हम तीन भाई थे। पिता यही जंगल में खेती और मजदूरी करते थे। करीब 60 साल पहले यहां भीषण बाढ़ आई, जिसमें समुदाय के लोगों का सारा सामान और मवेशियां बाढ़ में बह गए। इस हादसे में घासीराम के पिता और एक भाई भी बाढ़ के काल में समा गए। उस समय वहां आदिवासियों के करीब 10 घर थे। सभी की गृहस्थी का सामान भी बाढ़ में बह गया था। तब घासीराम के उम्र करीब 10-12 साल थी। तब समुदाय के अन्य लोगों के साथ वे अपने बडे भाई के साथ मजदूरी और आजीविका की तलाश में भटकते-भटकते खोंगरा मालूद में आकर बस गए।

घासीराम बताते है कि 60-65 साल पहले हम सहरियाओं की पूरी संस्कृति जंगल पर आधारित थी। जंगल में ही रहकर मजदूरी करते थे। तब दिनभर काम करने के बाद चार पाई अनाज या 10 रुपए मिलते थे। इस दौरान जंगल में मिलने वाली औषधियों को जानने की जिज्ञासा होने पर घासीराम ने समुदाय के बुजुर्ग लोगों से उनके साथ रहकर उपचार का तरीका भी सीख लिया। अब वे औषधियों से समुदाय के लोगों को इलाज करते है। वे जिस इलाके में रहते है उसे करिया पहाड़ या गढ़ी पहाड़ के नाम से जाना जाता है।

आदिवासियों के जंगल से जुड़ी औषधियों सार्वजनिक नहीं करने के पीछे उनका तर्क है कि अगर औषधियों की जानकारी सभी लोगों को पता चल जाएगी तो इसका हर्श भी वहीं होगा जो आज जंगलों को हो रहा है। जिस तरह तेजी से जंगल कट रहे है ऐसे ही एक दिन यहां की बहुमूल्य औषधि भी खत्म् हो जाएगी। करीब चार-पांच दशक पहले आदिवासी 35-40 प्रतिशत इलाज वन औषधियों के माध्यम से करते थे। पूर्वजों का यह ज्ञान आने वाले पीढ़ी को हस्तांतरित नहीं करने से इनका प्रतिशत वर्तमान में घटकर10-15 प्रतिशत रह गया है। वहीं, जंगलों के लगातार नष्ट होने और आदिवासियों को वन क्षेत्रों से खदेड़ने के कारण इस्तमाल की जाने वाली औषधियों के उपयोग में भी कमी आई है। अगर इसे समय रहते संरक्षित नहीं किया गया तो सहरियाओं की परंपरागत औषधि पूरी तरह से खत्म हो जाएगी।

उनकी एक मान्यता यह भी है कि दवा की जानकारी सार्वजनिक करने से इसका असर कम हो जाता है। इसलिए पुरानी पीढ़ी के लोग नई पीढ़ी को इसका ज्ञान नहीं देते। इसके पीछे इनके नियम और पर्यावरण के प्रति अटूट आस्था है। वहीं, युवओं में भी इस परंपरागत उपचार व्यवस्था में रूचि नहीं है। इसके पीछे उनका तर्क है कि पहले अस्पताल नहीं थे तो इस तरह की औषधियों की आवश्यकता थी। आज उपचार के लिए कई विकल्प खुले हैं। उनका कहना है कि अगर जड़ी बूटियों और टोटके के भरोस बैठे रहे और समय पर उपचार नहीं कराया तो बीमारी भी गंभीर रूप ले सकती है। वही, कुछ लोगों को मानना है कि वर्षों बाद भी वन औषधि से उपचार एक सेवा है। इसके रोजगारपरक नहीं होने से भी समुदाय के युवा इस पद्धति से उपचार करने में रूचि नहीं ले रहे हैं।

घासीराम सहरिया बताते है कि जंगल से औषधि लाने की एक बरसों पुरानी परंपरा रही है। जब भी हमें जंगल से जड़ीबूटी लाना होता है उससे एक दिन पहले या कभी तत्काल भी जड़ीबूटी के रूप में पेड़ में विराजमान देवता का पूजन, हवन और उस जड़ी के चमत्कारिक असर के लिए प्रार्थना करते है। इससे जड़ीबूटी का असरकारक क्षमता में दोगुनी वृद्धी हो जाती है। आदिवासी औषधि के लिए पेड़ों की जड़, तना, फूल, पत्तियां, मिट्‌टी और छाल का उपयोग करते है। इन पांच चीजों के मिलान करने से जड़ी प्रभावकारी हो जाती है।

विकास संवाद मीडिया फैलाशिप के अध्ययन के दौरान और निवेदन पर खोंगरा मालूद के बुजुर्ग घासीराम सहरिया ने न केवल कुछ औषधियों की जानकारी साझा की बल्कि उन्होंने जंगल में हमारे साथ भ्रमण कर दवाईयों के पेड़ों से भी परिचय कराया। यहां पाई जाने वाली औषधि और उनके उपयोग की विधि कुछ इस तरह है।

सेमल : सेमल का पौधा अपने आप में कई औषधि गुण को खजाना है। इसके नए पौधे की जड़ को मूसला (कंद) करते है, जो बहुत पुष्टिकारक, नपुंसकता को दूर करने में उपयोग होता है। सेमल से निकलने वाला गोंद मोचरस कहलाता है। यह अतिसार को दूर कर ताकत बढ़ाता है। इसके बीज मदकारी होते है। वहीं, काँटों में फोड़े, फुंसी, घाव, आदि दूर करते हैं। यह जंगल में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। समुदाय के लोग गर्मी के दिनों में इसे खोदकर घर ले आते हैं। जिसे वे कूटकर और सुखाकर इसका पावडर बनाकर इसका उपयोग करते हैं। इसे गर्भवती महिलाओं सहित समुदाय के सभी लोग ताकत बढ़ाने के लिए खाते हैं।

महुआ : इसे आदिवासियों की किशमिश कहा जाता है। महुआ वातनाशक और पोष्टिक है। यदि जोड़ों पर इसका लेपन किया जाय तो सूजन कम होती है और दर्द खत्म होता है। इससे पेट की बीमारियों से मुक्ति मिलती है। महुआ के ताजे फूलों का रस निकालकर उससे बरिया, ठोकवा, लप्सी जैसे अनेक व्यंजन बनाए जाते हैं।

करोंदा : करोंदा के पेड़ का आदिवासियों द्वारा सबसे ज्यादा उपयोग किया जाता है। घासीराम बताते है कि करौंदे का रोजाना सेवन करने से महिलाओं को खून की कमी (एनीमिया) से छुटकारा मिलता है। वहीं, करोंदे का रस हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है। इसके फल का चूर्ण खाने से पेट दर्द में दूर होता है, भूख बढ़ती है, दस्त की शिकायत दूर होती है, ज्यादा प्यास भी नहीं लगती। करोंदे के पत्ते दस्त में तेजी से फायदा करते हैं। सूखी खांसी में करौंदा की पत्तियां से निकलने वाला रस ज्यादा गुणकारी होता है। दांत संबंधी बीमारियों में भी फायदा करता है। सर्प के काटने पर करौंदे की जड़ को पानी में उबालकर इसका काढ़ा पिलाने से रोगी को लाभ मिलता है।

शमी : शरीर की गर्मी दूर करने के लिए शमी की पत्तियों का इस्तेमाल होता है और जिन्हें अत्यधिक पेशाब जाने की समस्या हो, उन्हें भी शमी की पत्तियों का रस सेवन कराते है।

सिंघाड़े : सिंगाड़ा का फल नाक से नकसीर यानी खून बहने पर फायदा करता है। प्रसव होने के बाद महिलाओं में कमजोरी आ जाती है। इसे दूर करने के लिए महिलाओं को सिंघाड़े का हलवा खाना चाहिए। वे महिलाएं जिनका गर्भाशय कमजोर हो वे सिंघाड़े का हल्वे का खाए तो फायदा मिलता है। इसके आलावा स्वेत प्रदर से पीड़ित महिलाएं सिंघाड़े के आटे का हलवा शाम को रोजाना खाने से लाभ मिलता है। यदि सूखे या खूनी बवासीर हो तो सिंघाड़े का सेवन से यह बीमारी ठीक हो जाती है। सिंगाड़े के आटे का लड्डू बनाकर नियमित सेवन करने से कई बीमारियां दूर होती है।

गुड़हल : आदिवासी इसके फूलों को तनाव दूर करने और नींद के लिए उपयोग में लाते हैं। गुड़हल के ताजे लाल फूलों को पीस कर बालों में लगाने से गुड़हल कंडीशनर की तरह कार्य करता है।

दूब घास: जंगल में सहरिया आदिवासी शारीरिक स्फूर्ति के लिए दूब घास का उपयोग करते है। नाक से खून आने पर ताजी व हरी दूब का रस दो-दो बूंद नथुनों में टपकाने से खून बंद हो जाता है। लगभग 15 ग्राम दूब की जड़ को एक कप दही में पीसकर लेने से पेशाब करते समय होने वाले दर्द से निजात मिलती है। दूब घास की पत्तियों को मिश्री डालकर और छानकर रोजाना पीने से पथरी की बीमारी दूर होती है।

कनेर: साधारण सा दिखने वाला कनेर का पेड़ बुखार से लेकर सर्प दंश और बिच्छु के काटने तक में इसका उपयोग होता है। कनेर की पत्ती को पीस कर दूध बालों पर लगाने से गंजापन ठीक हो जाता है।

जंगल प्याज: श्वांस रोग, बच्चों में कफ की शिकायत, भोजन का पाचन होकर दस्त साफ होता है। इसके लिए जंगली प्याज का रस निकालकर रोजाना 5-10 बूंद रोजाना सेवन करना होता है।

चिरोटा :चिरोटा का पौधा मैदानी इलाकों सहित जंगलों में भरपूर होता है। यह साधारण से दिखने वाले पौधे में कई औषधि गुण विद्धमान है। घासीराम बताते है कि चिरोटा की पत्तियों और बीजों को के उपयोग से पेट की मरोड़, दाद, खाज, खुजली और दर्द दूर होता है। इसकी पत्तियों को बारिक पीसकर घाव पर लगाने से चर्म रोग दूर हो जाते हैं। वही, चिरोटा की पत्तियों और बीज का काढा बनाकर पिलाने से पीलिया में फायदा होता है। इसके आदिवासी अंचलों और ग्रामीण इलाकों में पत्तियों का उपयोग बारिश के दिनों में भाजी के रूप में किया जाता है। आधुनिक विज्ञान भी इसके गुणों को एंटी बैक्टिरियल मानता है।

बेल: बेल के पत्ते दस्त और हैजा नियंत्रण में उत्तम हैं। इसके पके फलों के गूदे का रस या जूस तैयार करके पिलाने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।

तुलसी : जंगल और रहवासी क्षेत्र में आसानी से उपलब्ध होने वाली तुलसी में कई विशेष गुण है। इसका सहरिया बरसों से इस्तमाल करते आ रहे हैं। तुलसी का अर्क ब्लड कॉलेस्ट्रोल, एसिडिटी, पेचिस, कोलाइटिस, स्नायु दर्द, सर्दी-जुकाम, सिरदर्द, उल्टी-दस्त, कफ, चेहरे की क्रांति में निखार, मुंहासे, सफेद दाग, कुष्ठ रोग, मोटापा कम, ब्लड प्रेशर, हृदय रोग, मलेरिया, खांसी, दाद, खुजली, गठिया, दमा, मरोड़, आंख का दर्द, पथरी, नकसीर, फेफड़ों की सूजन, अल्सर, पायरिया, शुगर, मूत्र संबंधी रोग आदि रोगों में फायदेमंद है।

अशोक की छाल: महिलाओं के लिए अशोक का पेड़ वरदान है। गर्भाशय की बेहतरी, मासिक धर्म संबंधित रोगों आदि के निवारण के लिए यह उत्तम है। लगभग 50 ग्राम अशोक की छाल को दो कप पानी में खौलाया जाए जब तक कि यह आधा शेष ना बचे। इस काढे को ठंडा होने पर प्रतिदिन एक गिलास पीने से तेजी से फायदा होता है।

मक्का: ऊर्जा, ताकत और पीलिया रोग में लाभकारी है। आदिवासियों के अनुसार मक्के के दानों में वे सभी महत्वपूर्ण तत्व होते हैं जिनकी वजह से मांस-पेशियां और हड्डियां मजबूत बनती हैं। आदिवासी खून की कमी होने पर रोगी को मक्के की रोटियां खाने की सलाह देते हैं।

गिलोय : गिलोय, गोखरु, आंवला, मिश्री समान भाग मिलाकर 1-1 चम्मच 2 बार दूध से लेने पर शारीरिक ताकत बढ़ती है। इसे गर्भवती महिलाओं की कमजोरी दूर करने के लिए भी दिया जाता है। वहीं, गिलोय व सौंठ के चूर्ण खिलाने से हिचकी बंद हो जाती है। घृत के साथ सेवन करने से वात रोग दूर होता है। गुड के साथ सेवन करने से कब्ज नहीं होती। इसके अलावा गिलोय, हरड, नागर मोथा इन सबको चूर्ण बनाकर शहद के साथ सेवन करने पर चर्बी कम होकर मोटापा दूर होता है।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

पोषण की सुरक्षा से जुड़़ी थी सामाजिक परंपरा


सहरिया आदिवासियों में उनके पूर्वजों द्वारा स्थापित रीति रिवाज और परंपराएं बहुत सशक्त थी। इनके पीछे कुछ धार्मिक और सामाजिक मान्यताएं थी। जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से समुदाय के लोगों के लिए सीधे तौर पर पोषण की सुरक्षा से जुड़ी थी। इसमें ईश्वर, स्थानीय देवि देवताओं और टोने टोटके के प्रति अटूट आस्था थी। अन्य समुदायों की तरह पूजा और मनौती पूरी होने पर बलि देने के बाद सामूहिक भोज की परंपरा भी थी।


ऐसा माना जाता है सहरिया अपनी परेशानी, लाभ-हानि और बीमारी के समय स्थानीय देवताओं से मनौती मांगते थे। इसके पूरी होने पर सहराना और गांव के आसपास पूर्वजों द्वारा स्थापित देवताओं के ओटले पर जाकर पूजन कर मुर्गे और बकरों की बलि देते थे। जिसे बाद में सभी लोग इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते थे। इस तरह समुदाय के लोगों को मांस के रूप में एक दिन का पोषण मिल जाता था। सहरिया में यह सिलसिला पर्वों और त्योहारों पर विशेष रूप से चलता था। समुदाय में आज भी देवताओं के प्रति आस्था में कोई बदलाव तो नहीं आया है, लेकिन बलि देने की परंपरा में परिवर्तन जरूर दिखाई देने लगा है। यह कहना है कि विदिशा जिले के गंजबासौदा विकासखंड के तहत आने वाले गांव आमेरा निवासी 60 वर्षीय हरिराम सहरिया का।

वे बताते हैं कि स्थानीय देवी देवता समुदाय के लोगों को बुरी आत्माओं और आपदाओं से बचाते हैं। इसके अलावा बीमारियों से भी रक्षा करते हैं। उनका मानना है कि देवताओं में इतनी शक्ति होती है कि वे बांझ स्त्री को भी संतान देने का सामर्थ रखते हैँ। हमारे पूर्वजों को जब भी जंगल में कोई परेशानी होती थी तो इन्हीं देवताओं की शरण में जाकर उनकी पूजा कर मनौती मांगते थे। जिसके पूरी होने पर बलि देते थे।



इस तरह सहरिया में पूर्वजों द्वारा स्थापित आस्था का यह सिलसिला आज तक जारी है, लेकिन इसमें पहले की तुलना में अब कमी आई है। पहले बलि के लिए मुर्गे और बकरे आसानी से और कम कीमत में उपलब्ध हो जाते थे। इसलिए सहरिया भी बलि की मनौती को आसानी से पूरा कर पाता था। अब समय के साथ परंपरा में भी बदलाव आ गया है। बलि पर रोक लगने और आर्थिेक स्थिति ठीक नहीं होने से अब सांकेतिक बलि भी दी जाने लगी है। हरिराम बताते है कि इस सामाजिक परंपरा के पीछे पोषण की सुरक्षा भी जुड़ी हुई थी।

पूर्वजों के मिले परंपरागत ज्ञान के आधार पर ग्राम खोंगरा के 35 वर्षीय प्रताप सहरिया बताते हैं कि समुदाय में करीब15 देवि देवताओं को प्रमुख रूप से पूजा जाता है। इनमें ठाकुर देव, भैंरो देव, परीत देव, नाहर देव, दरेठ देव, कारस देव, भूमिया देव, नरसिंह देव, हीरामन देव आदि शामिल है। इसके अलावा कैला माता, कंकाली माता, बीजासन देवि, तेजाजी महाराज के साथ जिंद का पूजन करने की परंपरा है। प्रताप बताते हैं कि देव की पूजा करना जहां समुदाय की धार्मिेक और सामाजिक मान्यता है। वहीं, सहराना के सभी लोगों द्वारा देव के ओटले पर जाकर पूजा के बाद सामूहिक भोज करना हमें पोषण की सुरक्षा प्रदान करता है। खास बात यह है कि इस दौरान सभी सहरिया अपनी क्षमता के मुताबिक राशि इकट‌्ठा कर इस कार्यक्रम में शामिल होते है। इससे समुदाय के लोगों में सामाजिक सद्भावना भी बनी रहती है।


प्रताप समुदाय के स्थानीय देव के संबंध में बताते है कि ठाकुर देव बच्चों और बूढ़ों की रक्षा करने वाला देवता है। बच्चों को निमोनिया और बूढ़ों को पसली चलने पर ठाकुर देव की मनौती की जाती है। रोगी के ठीक होने पर शराब और बकरे की बलि देने की परंपरा पुर्वजों के समय से चली आ रही है। वहीं, भैंरो देव को पूजा देने से बांझ स्त्रियों को पु्त्र की प्राप्ति होती है। मनौती पूरी होने पर बकरे और मुर्गे की बलि दी जाती है। जब तक यह पूजा नहीं होती घर में झूला नहीं बांधा जाता। भैंरो देव की स्थापना पेड़ के नीचे या खुले चबूरते पर एक सिंदूर लगे लंबे या गोल पत्थर के रूप में होती है। इसी तरह भूमिया देव सहरियाओं के ग्राम देवता है।

प्रत्येक सहराना के बीच में भूमिया देव का ओटला बनाकर पत्थर पर स्थापित किया जाता है। इन्हें ग्राम के संरक्षक देव माना जाता है। भादों में समुदाय के सभी लोग एक दिन निश्चित कर भूमिया देव की गोठ और चिंहारे की पूजा करते हैं। इस दौरान पूरे गांव से रुपए और अनाज इकट्‌टे करते हैं। सगे संबंधियों के लिए जातीय भोज का आयोजन किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भूमिया देव की पूजा से गांव में बीमारी और संकट नहीं आते हैं। वहीं सामाजिक मान्यता के अनुसार विभिन्न देवताओं की मनौती और पूजा के बहाने समुदाय के लोगों द्वारा भोज देने की परंपरा के चलते पोषण संबंधी जरूरतें भी पूरी हो जाती है वहीं, सामाजिक सद्भाव भी बना रहता है।

सायबा निवासी 45 वर्षीय नंदलाल सहरिया बताते हैं कि समुदाय का मूल पर्व और त्योहार कौन से हैं यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है, लेकिन दशहरा, होली, दीपावली, रक्षाबंधन आदि त्योहार हिंदुओं के संपर्क में रहने के कारण हम लोग भी उसी तरह मनाते हैं। चैत्र में गुड़ीपड़वा, अन्नपूर्णा देवी की पूजा, देवउठनी ग्यारस, शीतला सप्तमी, जन्माष्टमी, नवरात्रि, श्राद्ध, नागपंचमी, आखातीज आदि पर्वों के उत्साह और परंपरानुसार मनाते हैं। इस दौरान इस दौरान मीठा भोजन घुघरी, खीर, पुड़ी, मालपुआ बनने की पंरपरा है। हरियाली अमावस्या पर सहरियाओं के खेत जोतने का त्योहार है। इसमें अच्छी फसल की कामना की जाती है। फसल आने पर चैत्र में पहले देवि देवताओं और पूर्वजों को नए अन्न का भोग लगाते हैं, फिर स्वयं खाते है। लेकिन वर्तमान में सहरिया की आर्थिेक स्थिति बेहतर नहीं होने से त्योहार मनाने की पंरपराओं में पहले की तुलना में कमी आ गई है।



रविवार, 17 जनवरी 2016

हर साल पांच करोड़ खर्च, फिर भी कुपोषण


विदिशा जिले के गंजबासौदा विकासखंड में बरसों से जंगली इलाकों में रहने वाले सहरिया जनजाति को आजादी के 62 साल बीतने के बाद भी न तो बुनियादी सुविधाएं मिली हैं और न ही इनमें फैले कुपोषण को दूर करने व पोषण आहार में बढो़तरी के जमीनीस्तर पर प्रयास हो रहे हैं। यहां शासन प्रति वर्ष पांच करोड़ रुपए कुपोषण को दूर करने पर खर्च कर रहा है। इन सबसे बावजूद वनांचलों में कुपोषण के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। विकासखंड में महिला एवं बाल विकास अधिकारी और स्वास्थ्य विभाग का अमला कभी वनांचलों में बसे इन आदिवासी गांवों की ओर कभी रुख ही नहीं करता।


कभी-कभार एएनएम और स्वास्थ्य कार्यकर्ता यहां आते हैं और औपचारिकता पूरी करके लौट जाते हैं। यहां के ग्राम आमेरा, खोंगरा मालूद, नहारिया, खजूरी आदि गांवों में सहरिया जनजाति के बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं। आज भी दूरदराज के आदिवासी बाहुल्य गांवों में बच्चे कुपोषण और बड़े कई गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं। उनको न तो सही ढंग से पोषण आहार मिल रहा है और न ही उपचार। स्वास्थ्य विभाग द्वारा पदस्थ किए गए कर्मचारी शहरों में रह रहे हैं। गांवों में महीने दो महीने में चक्कर लगाने जाते हैं। इससे सहरियाओं की हालत समय पर इलाज नहीं मिलने से लगातार बिगड़ती जा रही है।

इसका ताजा उदाहरण उदयपुर से मुरादपुर जाने वाले मार्ग पर बसे ग्राम आमेरा का है। यहां के निवासी लालजी सहरिया की सबसे छोटी बेटी एक साल की सुषमा इन दिनों कुपोषण की चपेट में है और उसकी स्थिति यह है कि अगर समय पर उसे इलाज नहीं मिला तो 15 दिन में उसकी मौत भी सकती है। लालजी सहरिया बताते है कि जब सुषमा पैदा हुई थी तब वह सामान्य वजन की थी। उसे कई दिनों से लगातार तेज दस्त लग रहे हैं। इसका स्थानीय स्तर पर इलाज भी कराया, लेकिन ठीक नहीं हुई। उसका पूरा शरीर सूख गया है। अब वह हडि्डयों का ढांचा रह गई है।

इसी गांव के हरिसिंह सहरिया, शिवचरण, भूरा, हरिनारायण व गुड्डा ने बताया कि उनकी बस्ती में दस्त, बायरल, खुजली फैली है। इससे बच्चे, महिलाएं व पुरुष परेशान है। उन्हें उपचार तक नहीं मिल पा रहा है। इसकी हमने कई बार स्वास्थ्य कार्यकर्ता को भी इस बारे में जानकारी दी, लेकिन कोई देखने तक नहीं आया। हम, लाचार और बेबस लोग अब करे भी तो क्या। हमारे पास इतने पैसे भी नहीं की इस बच्ची का इलाज करा सके। वहीं, ग्राम खोंगरा में दो वर्षीय नेहा कुपोषण जनित बीमारी का शिकार है। उसके बदन में फोड़े हो रहे हैं। यहां पोषण आहार की व्यवस्था भी सही नहीं है।


ग्राम नहारिया में 30 वर्षीय परसराम सहरिया का सबसे छोटा बेटा सात माह का गोपाल को भी कुपोषित है। उसका सामान्य से कम वजन होने के अलावा शरीर बहुत दुबला और कमजोर है। सहरिया आदिवासी बहुल्य इन गांवों में हालात बदतर होने के बावजूद गंजबासौदा विकासखंड में महिला एवं बाल विकास अधिकारी गंभीर नहीं हैं।

पोषण आहार की मात्रा को बढ़ाना चाहिए :

लालाजी बताते है कि स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा हर मंगलवार को पोषण आहार के रूप में दलिया का एक पैकेट दिया जाता है। जो परिवार के तीन-चार बच्चों के लिए पर्याप्त नहीं होता। यह पैकेट तो एक-दो दिन में ही खत्म हो जाता है। इससे समुदाय में पर्याप्त पोषण आहार नहीं मिलने से बच्चे में कम वजन, कुपोषण और कमजोरी लगातार बढ़ रही है। वहीं, बीपीएल परिवारों को राशन दुकान से एक महीने में 15 किलो गेहूं, पांच किलो चावल मिलते हैं, जबकि छह लोगों के परिवार में एक महीने में करीब एक क्विंटल अनाज की जरूरत पड़ती है। ऐसे में 20 किलो अनाज पूरे परिवार के लिए अपर्याप्त होता है। इसका सीधा असर समुदाय की गर्भवती महिलाओं पर भी पड़ रहा है। उन्हें गरीबी के कारण दूध, घी भी मुहैया नहीं होता है और न ही अतिरिक्त पोषण आहार मिलता है। जब शरीर को उसकी जरूरत के मुताबिक पोषण भोजन व पोषण आहार नहीं मिलेगा तो वह कमजोर हो जाएगा। घर में जो भोजन सभी के लिए बनता है उसे ही खाना पड़ता है। गर्भवती महिलाओं में अतिरिक्त पोषण नहीं मिलने से खून की कमी, एनिमिया और कमजोरी के मामलों में इजाफा हो रहा है।

आजीविका बढ़ाने के लिए करते हैं पलायन

समुदाय के 45 वर्षीय शिवचरण सहरिया बताते है कि आमेरा में करीब 28 परिवारों में 225 लोग रहते हैं। यहां कुछ लोगों को तो पट्‌टे पर दो बीघा जमीन मिली है, लेकिन इसके असिंचित होने से इतना अनाज भी पैदा नहीं होता की परिवार का पेट भर सके। जमीन पठारी इलाके में होने से पथरीली और कम उपजाऊ है। यहां तुअर, सोयाबीन, कपास बोवनी करते है। फसल आने के बाद जब खर्च जोड़ा जाता है तो बचत तो कुछ नहीं होती उल्टा कर्ज बढ़ जाता है। इससे समुदाय के लोग मजदूरी और आसपास की पत्थर खदानों में काम करते हैं। जब यहां काम नहीं मिलता तब आजीविका की तलाश पलायन करना पड़ता है। इसके लिए समुदाय के लोग उदयपुर, मुरादपुर के अलावा राजस्थान और आसपास के जिलों में मजदूरी की तलाश में पलायन करते हैं। ऐसे में ये लोग करीब छह महीने तक अपने परिवार से दूर रहते हैं। कई बार शादी विवाह जैसे आयोजनों के लिए कर्ज भी लेना होता है। इसे चुकाने के लिए दूसरे जिलों में जाकर मजदूरी करना होता है।

जननी वाहन के लिए मांगते हैं 600 रुपए

इसी गांव के 60 वर्षीय हरिराम सहरिया बताते है कि आज भी समुदाय की गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी गांव में ही दायी करती है। उनका कहना है कि हमारे गांव में जननी सुरक्षा योजना के तहत वाहन की सुविधा भी नहीं मिलती। कार्यकर्ता वाहन उपलब्ध कराने के लिए 600 रुपए मांगते हैं। अस्पताल दूर होने और निजी वाहन सुविधा नहीं होना सबसे बड़ी परेशानी है। इससे तो अच्छा है कि हम गांव में ही डिलीवरी करा लें। हरिराम मानते है कि ऐसे समय में गर्भवती महिला को ज्यादा सुरक्षा और इलाज की जरूरत होती है, लेकिन मेहनत, मजदूरी करने के बाद भी इतना पैसा नहीं मिलता की पेट भर सके। ऐसे में इलाज के लिए पैसे कहा से जुटाए? डिलीवरी के दौरान ही कुछ समय पहले रतिराम सहरिया की पत्नी ममता की मौत हो चुकी है। ममता के पेट में 8 माह का गर्भ था। रतिराम का कहना है कि अगर ममता को समय पर इलाज मिल जाता तो शायद वह आज हमारे बीच होती।

245 आंगनवाडी और 24 सहायक केंद्र

गंजबासौदा सहित पूरे विकास खंड में 245 आंगनवाडी और 24 सहायक केंद्र हैं। आंगनवाडी में सहायिका और कार्यकर्ता पदस्थ रहते हैं। कार्यकर्ता को प्रति माह 5000 रुपए और सहायिकाओं को 2500 रुपए मानदेय दिया जाता है। सहायक केंद्र पर पदस्थ कार्यकर्ता को 3250 रुपए हर महीने मिलते हैं। इस प्रकार इन पर हर महीने 19 लाख 14हजार 300 रुपए शासन द्वारा खर्च किया जा रहा है। वहीं, तीन लाख रुपए परियोजना के अधिकारियों और कर्मचारियों पर हर महीने खर्च हो रहे हैं। इसके अलावा केंद्रों को दिए जाने वाले पोषण आहार पर अलग लाखों रुपए महीने खर्च हो रहा है। इस सब खर्चों को जोड़ा जाए तो एक साल में करीब पांच करोड़ रुपए कुपोषण को मिटाने पर खर्च हो रहे हैं। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कुपोषण के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं।


2014 में 232 कुपोषित हुए भर्ती

शासकीय जन चिकित्सालय में स्थापित पोषण पुर्नवास केंद्र में वर्ष 2014 में 232 कुपोषित बच्चों को उपचार के लिए लाया गया। जबकि 2015 जनवरी से मार्च तक 34 पोषण पुर्नवास केंद्र में आए। इन आंकड़ों की बानगी यह बताने के लिए काफी है कि कुपोषण की क्या स्थिति है। यह उन इलाको की स्थिति है जहां कार्यकर्ताओं पर ग्रामीण और जनप्रतिनिधियों का दवाब बना रहता है, लेकिन कच्चे घरों और जंगलों में रहने वाले आदिवासियों की हालत बेहद खराब है।

नोट : यह जानकारी अप्रैल 2015 में सहरिया आदिवासी समुदाय पर किए गए अध्ययन पर आधारित है।

शनिवार, 16 जनवरी 2016

रोजगार मिले तो कर सकते हैं जड़ी-बूटियों का व्यवसाय


सहरिया आदिवासी : औषधियों के उपयोग से तो परिचित हैं, लेकिन वैज्ञानिक विधि से अनजान


जंगलों के आसपास रहने वाली सहरिया जनजाति के लोग। औषधीय पौधों को पहचानने में माहिर। फूल-पत्तियों और पौधों की जड़ों से इलाज का ज्ञान भी। लेकिन अब इस विधा से दूर हो रहे हैं। विदिशा जिले के गंजबासौदा ब्लॉक में सहरियाओं के परिवार विस्थापित हो रहे हैं। वजह नई पीढ़ी में इस ज्ञान को निखारने का उत्साह नहीं। जमा की गई जड़ी-बूटियों के दाम भी सही नहीं मिलते। न ही सरकार ने उनके पारंपरिक गुण वैज्ञानिक विधि से विकसित की कोई योजना बनाई।

गंजबासौदा विकासखंड के खोंगरा मालूद निवासी बुजुर्ग घासीराम सहरिया जंगल में मौजूद कई जड़ी बूटियों के बारे में जानते हैं। उनका कहना है कि जंगल में कई प्रकार की जड़ी-बूटियां थीं, जिसका उपयोग पूर्वजों द्वारा दवा के रूप में किया जाता था। बरसात में समय अपो की पत्ती, बड़ी बिलौया, छोटी बिलौया के फूल और पत्ते, चाबिलौरो की बेल, कांदा, कुंवा का बकुला बेल, गिलोय की पत्ती जैसे कई प्रकार की औषधि का उपयोग किया जाता था। वहीं, सर्दी के समय चितावर की जड़, छोटी-बड़ी आंवली, सयरे का फूल, अकौवा का फूल, शीशोन की फली, रवैर की फली, कनेर का पत्ता, अतरझारा, तिलथुआ और शहद जैसी चीजों का संग्रह करते थे। अगर शासन औषधियों से दवाइयां बनाने का वैज्ञानिक विधि से प्रशिक्षण दे तो हमें रोजगार तो मिलेगा ही साथ ही ओने-पोने दाम पर औषधि बेचने से छुटकारा मिले जाएगा।


दाम मिले तो बढ़ाएं खोजबीन

नहारिया गांव के मुन्नालाल सहरिया बताते है कि जड़ी बूटियों को संग्रह करने के अलग-अलग मौसम होते हैं। बरसात के बाद जड़ी बूटियां और पत्तियां मिलना शुरू होती है। यह काम चार महीने चलता है। जड़ी-बूटियों के गीली होने पर यह कम भाव में बिकती थी। जबकि सुखा कर बेचने से थोड़ा फायदा हो जाता था। साहूकार इन गीली औषधियों को सुखा कर आयुर्वेदिक प्रयोगशालाओं में महंगे दाम पर बेचते थे। पहले की तरह जंगल में जड़ी-बूटियों के उपयोग के प्रति रूझान भी कम हुआ है। सरकार अगर औषधि अच्छे दाम पर खरीदे तो समुदाय के युवा इस काम के लिए तैयार हो सकते हैं।

न पलायन बढ़ता, न ही पोषण में कमी आती

जंगलों के खत्म होने और आज की पीढ़ी के औषधि संग्रह और उनके उपयोग में रुचि नहीं लेने के कारण वे सब भूलते जा रहे हैं। रम्मू सहरिया बताते है कि सरकार द्वारा वन औषधियों के संग्रह को लेकर समुदाय के लोगों के लिए स्थाई रोजगार की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। अगर इनमें रोजगार की संभावना और औषधि निर्माण के वैज्ञानिक तरीके से क्षेत्र के युवाओं को प्रशिक्षण दिया जाता तो आज न तो समुदाय के लोगों का विस्थापन बढ़ता और न ही पोषण संबंधी समस्याओं में इजाफा होता।

समुदाय के लोगों से चर्चा कर बनाएंगे योजनाएं

स्वसहायता समूह बनाकर राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत वन औषधियों को संग्रह कराने का कार्य कराया जा रहा है। इसके लिए वन विभाग और आयुष विभाग इस तरह के कार्य पहले से ही कर रहे हैं। इन्हीं विभागों के माध्यम से जो सहरिया आदिवासी जड़ी-बूटियों के व्यवसाय को रोजगार के रूप में अपनाना चाहते हैं उन्हें स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण देकर औषधियों के व्यवसाय से जोड़ा जा सकता है। इस संबंध में जल्द ही समुदाय के लोगों से चर्चा कर एक योजना बनाई जाएंगी।
सीएम ठाकुर, एसडीएम, गंजबसौदा

शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

तथाकथित विकास में हाशिए पर आदिवासी




कभी प्रकृति की स्वच्छंद हवा और जल, जंगल पर राज करने वाला आदिवासी आज हाशिए पर है। वह अब तक न तो अपनी परंपरागत जीवनशैली से मुक्त हो पाया है और न ही आधुनिक विकास से तालमेल स्थापित कर सका है। इसी का परिणाम है कि आज वह जीवन बजाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। आदिवासियों के लिए आजीविका और रोजगार तो कभी सरकार की प्राथमिकता में रहा ही नहीं। उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर भी कभी गंभीरता नहीं दिखाई गई। ग्रामीण विकास की तमाम योजनाओं में भी उसकी कोई हिस्सेदारी नहीं है। वह बदहाल और लाचार है क्योंकि उसके साथ हमेशा से ही उपेक्षित व्यवहार हुआ।

अनंतकाल से जंगल की संस्कृति में रचा बसा, वहीं के तौर तरीकों से जीवन जीने की कला और पोषण के तरीकों से लेकर जड़ी-बूटियों से उपचार ही उसकी प्राथमिकता रहा है। लेकिन तथाकथित आधुनिक विकास ने वनों का राष्ट्रीयकरण कर जंगल से बेदखल कर कर दिया। कोदो, कूटकी, सवां, रमतीला, बाजरा, मक्का, ज्वार जैसी मोटे अनाज से उसे हमेशा से ही पोषण मिला, कंद मूल उन्हें शारीरिक उर्जा प्रदान करते रहे और जड़ी बूटियां से उपचार और ताकत मिलती रही। आज स्थितियां इसके बिलकुल उलट हो गई है। परंपरागत खाद्य सुरक्षा की चीजें आदिवासियों की थाली से पूरी तरह गायब हैं। जंगलों के खत्म होने से कई कंद और औषधियां अब अपना अस्तित्व खो चुके हैं। सरकार ने उसे पट्‌टे के नाम पर छोटे-छोटे जमीन के टुकड़े थमा दिए हैं। जिससे वह इतनी उपज भी नहीं ले पाता कि अपना पेट भर सके।


गंजबासौदा विकासखंड के आमेरा निवासी भूरालाल सहरिया ने बताया कि सरकार ने हमें पट्‌टे पर भले ही जमीन दे दी हो, लेकिन हम उपज इसलिए नहीं ले पाते कि जमीन को नाले के किनारे पर दे दिया गया है। बारिश के दौरान खेतों में पानी भर जाता है और पूरी फसल नष्ट हो जाती है। सिंचाई की सुविधा नहीं होने से गेहूं और चने की फसल नहीं ले पाते। फसल बोते भी हैं तो लागत नहीं निकलती है। समुदाय के कई लोगों ने तो इस परेशानी को देखते हुए जमीन को ठेके पर देना शुरू कर दिया है। इससे नकद पैसा मिल जाता है, जिससे हम लोग घर-गृहस्थी का सामान खरीद लेते हैं। खेतों में मजदूरी से ही आजीविका चलती है।


खदानों के बंद होने से हुए बेरोजगार :

शिवलाल सहरिया ने बताया कि समुदाय के लोग तीन महीने से बेरोजगार हैं। यहां पत्थरों की खदानों में काम करके रोजाना करीब 150 रुपए कमा लेते थे, लेकिन पिछले दिनों झाबुआ जिले के पेटलावद में हुए विस्फोट के बाद क्षेत्र की सभी खदानें बंद हो गई है। खेतों में भी इतना काम नहीं मिलता कि परिवार का पेट भर सकें। अब आजीविका के लिए विस्थापन के अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचा है। गौरतलब है कि गंजबासौदा विकासखंड में उदयपुर क्षेत्र के सहरिया बहुल्य 25 गांवों में करीब सात हजार मजदूर पत्थरों की खदानों में काम करते थे, जो अब बेरोजगार हो गए हैं।


परंपरागत उपचार में अधिक विश्वास :

सहरिया वन औषधियों के अच्छे जानकार माने जाते हैं। वे आज भी सुदूर वनांचलों में अपने परंपरागत तरीकों से ही उपचार करते हैं। खोंगरा के 70 वर्षीय काशीराम सहरिया बताते हैं कि वे मशेर फली, लाफर फेंदा, अमरवेल, सदामस्ती, गुड़बेल, दुधई, नाय, मोरपंख, चेंच,किरवारे की केस, कनउउआ, छोटी नौरी, अचार गुठली, बेकल का पत्ता, पोमार की मुगदार आदि का उपयोग प्राथमिक उपचार के लिए करते हैं। लेकिन इलाज की विधि वैज्ञानिक नहीं होने और अंधविश्वास हावी होने के कारण कई बार लापरवाही की वजह से गंभीर बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। समुदाय के बुजुर्ग आज भी अस्पताल के इलाज पर भरोसा न कर समुदाय के गुनिया पर ही विश्वास करते हैं, लेकिन युवा पीढ़ी ने परंपरागत उपचार के मिथक को तोड़कर अस्पतालों में इलाज और टीकाकरण में रूचि लेना शुरू कर दिया है।
बारिश में सबसे ज्यादा परेशानी :

ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल के 10 से 15 किलोमीटर के दायरे में आने वाले लोगों में आंगनबाड़ी और एएनएम की वजह से जागरूकता आने लगी है। महिलाओं के प्रसव भी अस्पतालों में होने लगे हैं, जन्म के तत्काल बाद बच्चे को मां का दूध भी मिलने लगा है। इससे मातृ शिशु मृत्यु दर में कभी भी आई है, लेकिन सुदूर वनांचलों में आज भी हालात जस के तस हैं, वहां दायियों (बसौड़ जाति की महिलाओं) द्वारा ही प्रसव कराया जाता है, जो कई बार असुरक्षित होता है। पोषण आहार और टीकाकरण की सुविधा भी कई बार उन्हें उपलब्ध नहीं हो पाती। इस समस्या के लिए आवागमन की सुविधा नहीं होना, अस्पताल की दूरी सबसे बड़ी दिक्कत हैं। बारिश के दिनों में तो यह दिक्कत गंभीर रूप ले लेती है।

नहीं मिलता पर्याप्त पोषण :

कहा जाता है कि सहरिया आदिवासियों में बड़े व्यक्ति की मौत टीबी और बच्चों की मौत कुपोषण की वजह से होती है। इसका कारण खाद्य असुरक्षा है। हालांकि बच्चों और गर्भवती महिलाओं में इसका होना सबसे ज्यादा चिंता का विषय है। गर्भावस्था के प्रारंभिक दिनों में महिला को उसकी जरूरत का भोजन और पोषण नहीं मिले तो नवजात शिशु कुपोषित हो सकता है। इसी तरह शिशु के जन्म के तत्काल बाद से छह माह तक सिर्फ मां का दूध और फिर छह माह की उम्र तक पर्याप्त पूरक आहार नहीं मिले तो उसके कुपोषित होने की आशंका बढ़ जाती है। डब्ल्यूएचओ ग्लोबल हेल्थ ऑब्जर्वेटरी के मुताबिक बच्चों में मौत का कारण 35 प्रतिशत कुपोषण है। इसके अलावा निमोनिया 18 प्रतिशत, नवजात मृत्यु 35 प्रतिशत, डायरिया 11 प्रतिशत, खसरा 1 प्रतिशत, एड्स 2 प्रतिशत, मलेरिया 7 प्रतिशत, चोट 5 प्रतिशत और अन्य परिस्थितियां 16 प्रतिशत हैं।

युवा अवस्था में ही बुढ़ापा हावी :

खाद्य असुरक्षा का प्रभाव बड़े-बुजुर्गों में भी देखने को मिलता है। पत्थर की खदानों में काम करने से युवा अवस्था में ही बुढ़ापा हावी होने लगता है। यहां पूरे क्षेत्र में करीब सात हजार मजदूर खदानों में काम करते हैं। लमनिया के 40 वर्षीय भगवान सिंह सहरिया ने बताया कि पिछले 25 साल से खदानों में काम कर रहा हूं। सांस लेने पर पत्थरों की धूल नाक और मुहं में चली जाती है। पत्थरों को तोड़ने के लिए घन चलाना पड़ता है। इससे छाती में ताकत पड़ती है। समय पर न तो खाना खाते हैं और न ही अतिरिक्त पोषण के रूप में कुछ मिलता और लगातार फेफड़ों में धूल के जमा होने से टीबी सहित कई संक्रामक बीमारियों का शिकार होना पड़ रह है। विकासखंड के सहरिया बहुल्य 25 गांवों में अगस्त 2013 से जनवरी 2015 के दौरान टीबी के मरीजों में 165पुरुष और 39 महिलाओं में टीबी की पुष्टि हुई। जिसमें 104 पुरुष और 20 महिलाओं को उपचार मिला। वहीं, 25पुरुष और 09 महिलाओं की मौत हो गई।

रविवार, 27 दिसंबर 2015

कुपोषण के खिलाफ जन आंदोलन क्यों नहीं ?

महिला एवं बाल विकास विभाग के माध्यम से संचालित आंगनबाड़ी केंद्रों के खुलने के बाद भी बच्चों में कुपोषण के मामलों में कमी नहीं आई है, लेकिन विभाग के अफसरों का कुपोषण जरूर दूर हुआ है। इसी का परिणाम है कि भारत 2015 तक कुपोषितों की संख्या को आधा करने के लक्ष्य को हासिल करने में नाकाम रहा है। विभाग द्वारा कई योजनाओं का संचालन सिर्फ कागजों पर ही किया जा रहा है। इसके चलते जमीनीस्तर पर न तो बच्चों को कोई लाभ नहीं मिल रहा है और न ही गर्भवती महिलाओं को पर्याप्त पोषण आहार मुहैया कराया जा रहा है। जबकि मध्यप्रदेश सरकार भी कुपोषण के कलंक को प्रदेश से मिटाने की बात कई बार कह चुकी है, लेकिन विभाग के अफसरों की इच्छाशक्ति में कमी और कठोर प्रावधान नहीं होने से वे न तो क्षेत्र का दौरा करते हैं और न ही पोषण आहार वितरण को लेकर गंभीर है।

हमारे प्रधानमंत्री भी विकास की विभिन्न योजनाओं में जनाआंदोलन की बात करते हैं। चाहे मामला स्मार्ट सिटी का हो या फिर स्वच्छता अभियान का। क्या हम देश में बच्चों के कुपोषण के खिलाफ जनांआदोलन खड़ा नहीं कर सकते ? क्या कारण है कि भारत में 5 साल से कम उम्र के करीब 10 लाख बच्चे हर साल कुपोषण के कारण मर जाते हैं? इतना ही नहीं कुपोषण के मामले में भारत दक्षिण एशिया का अग्रणी देश बन गया है, जहां कुपोषण के मामले सबसे अधिक पाए जाते हैं। जिस तरह प्रधानमंत्री ने पहल कर 'बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ' अभियान को राष्ट्रीय स्तर पर एक गंभीर मुद्दे को उठाया है। वह निश्चित ही स्वागत योग्य कदम है। लेकिन जब बेटियों की मौत कुपोषण से नहीं होगी तब ही तो हम उन्हें पढ़ा पाएंगे और बचा सकेंगे।

एसीएफ की रिपोर्ट बताती है कि भारत में कुपोषण जितनी बड़ी समस्या है, वैसा पूरे दक्षिण एशिया में और कहीं देखने को नहीं मिला है। रिपोर्ट में लिखा गया है, "भारत में अनुसूचित जनजाति (28%), अनुसूचित जाति (21%), पिछड़ी जाति (20%) और ग्रामीण समुदाय (21%) पर अत्यधिक कुपोषण का बहुत बड़ा बोझ है."। इसके बावजूद न तो देश के जनप्रतिनिधियों में कोई गंभीरता नजर आ रही है और न ही महिला एवं बाल विकास के अफसर सरकारी ढरर्रा से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं।

फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन की हाल ही जारी की गई एक सालाना रिपोर्ट बताया गया है कि भारत में 1946 लाख लोग कुपोषण के शिकार है। यह भारत की कुल आबादी का करीब 15 प्रतिशत हिस्सा है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत अपनी औसत आर्थिक वृद्धि के अनुरूप फूड वितरण प्रणाली को बदलने में नाकाम रहा। इससे साबित होता है कि देश में समग्र आर्थिक विकास होने के बावजूद भूखे, गरीब लोगों को फायदा नहीं मिला। भारत 1990-92 से अब तक देश में कुपोषितों की संख्या में 36 फीसदी की कमी लाने में कामयाब रहा। जबकि चीन ने इतने ही समय में कुपोषितों की तादाद 60.9 फीसदी तक कम कर ली है।

यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत 2015 तक कुपोषितों की संख्या को आधा करने के लक्ष्य को हासिल करने में नाकाम रहा। एफएओ ने पाया कि लक्ष्य को हासिल करने की भारत की गति बहुत धीमी है। कुपोषण का सबसे ज्यादा बोझ दक्षिणी एशिया में है। कुपोषितों की संख्या में कमी लाने में बांग्लादेश और नेपाल ने भारत से काफी बेहतर प्रदर्शन किया। 1990-92 से अब तक नेपाल में कुपोषितों की संख्या में 65.6 फीसदी और बांग्लादेश में 49.9 फीसदी की कमी आई है। कुपोषितों की संख्या को आधा करने के लक्ष्य को चीन ने पूरा कर लिया है। भारत की स्थिति देखते हुए लग रहा है कि वह 2020 तक भी अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाएगा।

मध्यप्रदेश सरकार भी 80 हजार से अधिक आंगनबाड़ी केंद्र और 12 हजार से अधिक मिनी आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से कुपोषण के कलंक को मिटाने की बात कर रही है। कुपोषण के मामले में 8फीसदी की कमी लाने का दावा भी किया जा रहा है, लेकिन जमीनीस्तर पर जरूरतमदों को इन आंगनबाड़ियों का कोई ज्यादा फायदा नहीं मिल रहा है।मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचलों में आज भी 71.4 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। प्रदेश का औसत 60.3 प्रतिशत है। इसका अर्थ यह है कि शिशु कन्याओं को सही पोषण, उपचार, टीकाकरण न होने से वे कम वजन, पोषक तत्वों की कमी, धीमी गति से वृद्धि जैसी समस्याएँ भोगती हैं।

शासन के नियमानुसार आंगनबाड़ियों के खुलने का समय तो निर्धारित कर दिया है, लेकिन वे खुलते कार्यकर्ता और सहायिकाओं की मर्जी पर ही है। इसका असर यहा हो रहा है कि न तो बच्चों को सही तरीके से मध्याह्न भोजन दिया जा रहा है और न ही पोषण आहार। मीनू के मुताबिक तो आज तक बच्चों को पोषण आहार मिला ही नहीं हैं। यह बात विदिशा जिले के गंजबासौदा विकासखंड में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने चर्चा के दौरान खुद स्वीकार की।

तहसील के सहरिया आदिवासियों में वर्ष 1993 से 2005 तक 113 से अधिक बच्चों की मौत कुपोषण से हो चुकी है। इस मामले के प्रदेश स्तर पर उठने के बाद 2002 में विकासखंड के उदयपुर क्षेत्र के सहरिया बहुल्य 25 गांवों को कुपोषण के लिए चिन्हित कर दिए गए। इन गांवों में आज भी वही स्थिति है जो पहले थी। हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। इतना जरूर है कि पहले की तुलना में कुपोषण से मौत होने का आंकड़ा कम हो गया है। इन इलाकों में महिला एवं बाल विकास अधिकारी और स्वास्थ्य विभाग का अमला कभी वनांचलों में बसे इन आदिवासी गांवों की ओर कभी रुख ही नहीं करता। कभी-कभार एएनएम और स्वास्थ्य कार्यकर्ता यहां आते हैं और औपचारिकता पूरी करके लौट जाते हैं।

यहां के ग्राम आमेरा, खोंगरा मालूद, नहारिया, खजूरी, सहायबा आदि गांवों में सहरिया जनजाति के बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं। दूरदराज गांवों में बच्चे कई गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं। उनको न तो सही ढंग से पोषण आहार मिल रहा है और न ही उपचार। स्वास्थ्य विभाग द्वारा पदस्थ किए गए कर्मचारी शहरों में रह रहे हैं। गांवों में महीने दो महीने में चक्कर लगाने जाते हैं। इससे सहरियाओं की हालत समय पर इलाज नहीं मिलने से लगातार बिगड़ती जा रही है। यहां फरवरी से जुलाई 2015 के बीच कुल 1308 बालक और 1342 बालिकाओं का वजन सामान्य था। वहीं 254 बालक और 231बालिकाओं का वजन कम था। इसके अलावा गंभीर कुपोषित बच्चों में 41 बालक और 37 बालिक दर्ज किए गए।

अगर सरकार कुपोषण को लेकर सही मायने मे गंभीर है तो हमें इस मुद्दें को जनांदोलन का रूप देना होगा। सरकार से सभी विभागों को इसमें सम्मिलित कर ऐसी योजना बनानी होगी, जिसका लाभ जमीनीस्तर पर लोगों को मिले। इसके लिए समुदाय के लोगों की समस्याओं और रोजगार की स्थानीय स्तर पर उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी होगी। नियमित आंगनबाड़ी केंद्र खुले, बच्चों की उपस्थिति शतप्रतिशत रहे, पर्याप्त पोषण आहार मिले, गर्भवतियों की नियमित जांच और उपचार पर गंभीरता से ध्यान दिया जाए। तभी हम प्रदेश से कुपोषण के कलंक को धो सकते हैं।



गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

आदिवासियों में परंपरागत पोषण नहीं मिलने से घटी कार्यक्षमता



कभी जंगलों में रहकर अपनी आजीविका चलाने वाले बारेला समुदाय के आदिवासी परिवार अब गांवों के आसपास बसने लगे हैं। उनकी सदियों पुरानी परंपरागत आदिवासी खाद्य सुरक्षा लगभग खत्म हो चुकी है, जो कभी कंदमूल फल, कोदो, कुटकी, मक्का, Óवार के रूप में उन्हें आसान थीं। जिनसे वे अपनी खाद्य सुरक्षा के लिए पोषण आहार ग्रहण करते थे, लेकिन अब वे गेहंू, कपास और सोयाबीन जैसी नगदी फसलों का उत्पादन कर रहे हैं। यह फसलें आदिवासी समुदाय की संस्कृति का हिस्सा नहीं है। हालांकि फिर भी इनकी खाद्य सुरक्षा में पहले की तुलना में सुधार हुआ है, लेकिन बारेला आदिवासी आज भी आहार में पोषण को लेकर तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं।"

देवास जिले की खातेगांव तहसील के पटरानी पंचायत में छोटी खिवनी नामक गांव में खरगोन जिले से कुछ बारेला आदिवासी परिवार यहां आए हैं। पहले यहां पर इस समुदाय के लोग बहुत कम थे। खरगोन के राजपुर तहसील में इनके पूर्वजों के पास रोजगार का कोई साधन न होने पर आसपास के क्षेत्र में पलायन कर दिया। वहां से इन्होंने रोजगार के लिए कई स्थान बदले और अंत में खातेगांव के खिवनी गांव में आकर बस गए। समुदाय के 70 वर्षीय लालू पटेल बताते हैं कि करीब 60 साल से अधिक हो गए जब हमारे पिता हमें लेकर खिवनी आए थे। पिताजी को पता चला था कि देवास जिले के वन ग्रामों में सरकार द्वारा आदिवासियों को खेती के लिए जमीन दी जा रही है। उस समय यहां भवरासकर रेंजर की ड्यिूटी थी। उनका मानना था कि आदिवासियों को खिवनी रेंज में बसाने से जंगलों में आग लगने और लकड़ी चोरों को पकडऩे में मदद मिलेगी। इसलिए उन्होंने यहां वन क्षेत्र में बारेला आदिवासियों को जमीन उपलब्ध कराई। लालू पटेल ने बताया कि पूरे वन ग्राम में सन 1945-50 से लेकर अब तक आसपास के क्षेत्र में करीब 120 परिवारों को पट्टे पर जमीन दी गई है। छोटी खिवनी मेंं वन विभाग ने समुदाय के 26 परिवारों को अधिकार पत्र दिया है। वहीं, 14 परिवार इससे अब भी वंचित है। जिसके लिए वन विभाग और प्रशासन के अधिकारियों से संपर्क कर रहे हैं।"

आजीविका के बारे में लालू पटेल बताते हैं कि हमारे पूर्वज गोंद, शहद एवं कंदमूल फल आदि लाकर अपना और अपने परिवार का पेट भरते थे। इससे समुदाय के लोगों का शरीर निरोगी एवं पुष्ट बनाने में मदद मिलती थी। इसके अलावा उदर पोषण के लिए Óवार, मक्का, कोदों, कुटकी जैसे मोटे एवं सस्ते अनाजों की फसल पैदा करते थे, लेकिन सरकार की अजीबो गरीब कृषि नीति के कारण अब आदिवासी कमाई के लालच में कपास, सोयाबीन जैसी नगदी फसलों की पैदावार करने लगे हैं। अब तो नगदी फसलों की खेती भी कम हो रही हैं, क्योंकि उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों की बढ़ती क़ीमतों के कारण उत्पादन की लागत भी बढ़ गई हैं। फिर भी पैसे के लालच में आदिवासी किसान परंपरागत खेती को छोड़कर नगदी फसलों पर ही ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं। इस कारण अनाज के मामले में अब तक आत्मनिर्भर रहे बारेला आदिवासी भी अब सरकारी और मुफ्त के राशन पर आश्रित हो गए हैं। वहीं, परंपरागत फसलों का उत्पादन बंद होने से शारीरिक कमजोरी होने लगी है साथ ही कार्यक्षमता भी घटी है। समुदाय के लोग मुख्य रूप से खेती और मजदूरी पर ही निर्भर हैं।"


समुदाय के राजाराम पडिय़ार बताते हैं कि हमारे दादा-परदादा जंगल में जब शिकार करने जाते थे तो वे परिवार के सदस्यों व गर्भवती महिलाओं के पोषण के लिए जंगल से कंद लाते थे। जिनके सेवन से उन्हें किसी प्रकार की परेशानी नहीं होती थी और पैदा होने वाला ब"ाा भी स्वस्थ्य होता था। अब स्थिति यह है कि बिना अस्पताल गए डिलीवरी होने में डर बना रहता है। हर दो-तीन महीने में समुदाय की गर्भवती महिलाओं को डॉक्टर के पास ले जाना पड़ता है। इसके बाद उन्हें कई दिनों तक दवाइयां खानी पड़ती है। वहीं, समुदाय में अब भी कम उम्र में शादी होने का सिलसिला खत्म नहीें हुआ। हालांकि जागरूकता का असर इतना हुआ है कि पहले बचपन में शादी तय हो जाती थी। अब समुदाय में 15 साल से कम उम्र की लड़की की शादी नहीं करते। समुदाय में अशिक्षा के कारण न तो वे पोषण की जानकारी रख पाती हैं और उनके गर्भवती होने पर उन्हें अलग से पोषण के लिए अहार मिलता हैं। "




समुदाय की रामबाई ने बताया कि मैंने गर्भवती होने पर अलग से कुछ भी खाया, जो भी परिवार के सदस्यों के लिए बनता था। उसे ही हम खाते थे। हां, अब आंगनवाड़ी केंद्रों से खिचड़ी और सत्तू दिया जाता है। वह भी कभी कभार ही मिलता है और जो मिलता है वह भी अपर्याप्त होता है। अंडा, मांस और मछली का सेवन भी नियमित नहीं कर पाते हैं। जानवरों की कमी होने से दूध की किल्लत हमेशा बनी रहती है। राम बाई ने बताया कि एक साल पहले समुदाय की दो महिलाओं को कम वजन के दुबले-पतले ब'चे पैदा हुए थे। जिनका इलाज अस्पताल में चल रहा है। पहले बीमार होने पर ब"ाों ने खाना-पीना भी बंद कर दिया था और रात को रोते रहते थे। अब इन ब"ाों की हालत में धीरे-धीरे सुधार भी आ रहा है। समुदाय के सदस्यों व महिलाओं मेें पहले की तुलना में जागरुकता आ रही है। वे स्थानीय झाडफ़ूंक का सहारा लेने के अलावा अस्पताल में डॉक्टर से इलाज कराने को लेकर भी गंभीर है। इसी का परिणाम है कि इस गांव में ब"ाों में कुपोषण का स्तर नहीं के बराबर है।