शनिवार, 18 जनवरी 2014

बारेला समुदाय के लोग देसी तकनीक से करते हैं फसलों का उत्पादन



आदिवासी अंचलों में बारेला समुदाय के लोग २१ सदीं में भी आधुनिक खेती को वरियता न देकर परंपरागत खेती को महत्व देते है। उनका मानना है कि देसी तकनीक से पैदा होने वाले उपज में पोष्टिक तत्व भरपूर होता है। वहीं, इस तकनीक के प्रयोग से जमीन की उर्वरक शक्ति भी खत्म नहीं होती। वन विभाग और राजस्व द्वारा सीमित जमीन मिलने से समुदायों की कोशिश रहती है कि फसलों का उत्पादन भी कम लागत में अधिक किया जाए। इसके लिए मिश्रित खेती को अधिक महत्व देते हैं।

देवास जिले की खातेगांव तहसील के पांचापुरा निवासी सुनील मोरे बताते है कि हमारे पूर्वजों के पास पहले कोई जमीन नहीं थी। वे जंगलों में रहकर अपनी जरूरतों की पूर्ति करते थे। इस दौरान उन्हें जहां भी खाली जमीन मिलती वे समुदाय के लिए कोदो, ज्वार, बाजरा, चना, अरहर, कुटकी और मक्का का उत्पादन कर लेते थे। इसके अलावा जंगलों में मिलने वाली वनोपज आंवला, हर्रा, सीताफल, आम, इमली, सफेद मूसली, शतावर, शहद, जामून, बेर, अचार जैसे कई जंगली फल और जड़ी बूटियां से भरपूर पोषण मिलता था। वैसे समुदाय के लोगों को बारह महीने जंगलों से पोषण को बढ़ावा देने वाली चीजें मिलती थी, लेकिन जब इनकी फसल खत्म होने की कगार पर होती थी तो हमारे पूर्वज खेती करके फसलों का उत्पादन करते थे। वर्तमान में आदिवासी क्षेत्रों की जमीन का अधिकांश हिस्सा उबड़-खबड़ और असमतल है। यहां पर काली मिट्टी के साथ पथरीली जमीन होने के कारण उत्पादन क्षमता कम है।

सुनील मोरे का मनाना है कि पहले की तुलना में अब बहुत सी चीजें उलट हो गई है। जंगलों में स्वछंद होकर रहने वाले आदिवासी अब सीमित जमीन के टुकड़े पर खेती करने को मजबूर हैं। वनोपज पर भी सरकार का नियंत्रण हो गया है। जमीन का राष्ट्रीयकरण होने से आदिवासी समुदाय जंगल आधारित परंपरागत व्यवस्था से पूरी तरह कट गए हैं। अब वे गांवों के आसपास व अपने खेतों के करीब घर बनाकर रहते हैं। आदिवासी समुदाय के लोग २१ सदीं में भी परंपरागत खेती को महत्व देते हैं। इसके लिए वे फसलों की तीन चक्रों में बोवनी करते हैं। जिन्हें खरीफ, रबी और जायद कहा जाता है।

खरीफ के सीजन में मुख्य रूप से धान, मक्का, सोयाबीन, मूंग, राजगिरा, ज्वार, चना और कपास जैसी फसलों का उत्पादन करते हैं। इसी सीजन में जंगलों से भी इन्हें पोषण अहार से युक्त कई तरह की भाजी मिलती है। जिनमें खट्टी पत्ता भाजी, धनवहार रेला, कुंदरू, चिरोटा, कचनार, ककोड़ा, गठालु आदि शामिल हैं। समुदाय के लिए खरीफ की फसल साल भर खाद्य सुरक्षा की पूर्ति करती है। इसलिए अधिकांश जोर इसी पर दिया जाता है। इसके लिए चरणबद्ध तरीके से काम किया जाता है।

सबसे पहले फसलोत्पादन संबंधी काम जैसे खेत को हल बक्खर की मदद से तैयार करना। बारिश में जमीन की पर्याप्त नमी मिलने के बाद बोवनी कर करना। अगले चरण में निंदाई, देसी खाद देना, खरपतवार की छटांई, जैसे काम करने पड़ते हैं। फसल पककर तैयार होने के बाद कटाई और फिर घर लाकर सफाई जैसे काम समुदाय के सभी लोग मिलकर करते है। इसके बाद अनाज को साल भर की खाद्य सुरक्षा के लिए भंडारित किया जाता है। जिसे जरूरत के मुताबिक थोड़-थोड़ा उपयोग किया जाता है। वहीं, वनोपज संज्ज््रहण में कंद, भाजी और फल एकत्रित किए जाते हैं, जिन्हें धूप में सुखाकर साल भर उपयोग करते हैं। इस काम का घर की महिलाएं भी मदद करती है।

खेत में मेहनती काम जैसे हल चलाना, सिंचाई अनाज की ढुलाई मवेशियों को चराने, वनोपज बेचने जैसे काम पुरुषों द्वारा किए जाते हैं। गांव में मजदूरी करने के लिए पुरुष और महिलाएं दोनों ही जाते हैं। वहीं, रबी सीजन में खेती पूरी तरह पानी की उपलब्धता के आधार पर होती है। इस दौरान गेहूं, चना, मसूर, अल्सी, मूंग बोया जाता है। जायद के सीजन में खेती क्षेत्र में नहीं होती, क्योकि क्षेत्र के सभी नदी-नालों का पानी पूरी तरह से सूख जाता है। ऐसे में इन्हें या तो दूसरे बड़े किसानों के यहां खेती करना पड़ता है। या फिर मजदूरी।

समुदाय के ५० वर्षीय राधेश्याम बारेला बताते है कि खेती के दौरान रसायनिक खाद को वरियता न देकर देसी तकनीक से बनाया गोबर की खाद इस्तमाल करते हैं, जिसे स्थानीय स्तर पर तैयार किया जाता है। कुछ लोग जंगली पत्तों और तंबाकू आदि की मदद से देसी कीटनाशक दवाई बनाते हैं। इनके इस्तेमाल से शरीर पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। वहीं, बीज को उपचारित करने का अपना एक तरीका भी है। जिसे रक्षाबंधन के बाद भुजरिया पर्व से जोड़कर देखा जाता है।

समुदाय के लोगों का मनाना है कि पहले हमारे पुर्वज गेहंू के बीज का परिक्षण करने के लिए भुजरिया उत्सव मनाते थे, यह परंपरा क्षेत्र में आज भी कायम है। इसमें रबी सीजन की बोवनी से पहले बीज को सावन में ही परिक्षण के लिए बोते है। इसके अलावा खरीफ सीजन में मिश्रित फसल जैसे मक्का, सोयाबीन, ज्वार, हरी सब्जी, भाजी, ककड़ी आदि को बोया जाता है। जिनसे समुदाय के पोषक तत्व भी भरपूर मिलते हैं। आज स्थिति यह आदिवासी क्षेत्र में समुदाय के लोगों के पास कम जमीन होने के बावजूद वे अपनी खाद्य सुरक्षा को लेकर गंभीर है।

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