शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

तथाकथित विकास में हाशिए पर आदिवासी




कभी प्रकृति की स्वच्छंद हवा और जल, जंगल पर राज करने वाला आदिवासी आज हाशिए पर है। वह अब तक न तो अपनी परंपरागत जीवनशैली से मुक्त हो पाया है और न ही आधुनिक विकास से तालमेल स्थापित कर सका है। इसी का परिणाम है कि आज वह जीवन बजाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। आदिवासियों के लिए आजीविका और रोजगार तो कभी सरकार की प्राथमिकता में रहा ही नहीं। उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर भी कभी गंभीरता नहीं दिखाई गई। ग्रामीण विकास की तमाम योजनाओं में भी उसकी कोई हिस्सेदारी नहीं है। वह बदहाल और लाचार है क्योंकि उसके साथ हमेशा से ही उपेक्षित व्यवहार हुआ।

अनंतकाल से जंगल की संस्कृति में रचा बसा, वहीं के तौर तरीकों से जीवन जीने की कला और पोषण के तरीकों से लेकर जड़ी-बूटियों से उपचार ही उसकी प्राथमिकता रहा है। लेकिन तथाकथित आधुनिक विकास ने वनों का राष्ट्रीयकरण कर जंगल से बेदखल कर कर दिया। कोदो, कूटकी, सवां, रमतीला, बाजरा, मक्का, ज्वार जैसी मोटे अनाज से उसे हमेशा से ही पोषण मिला, कंद मूल उन्हें शारीरिक उर्जा प्रदान करते रहे और जड़ी बूटियां से उपचार और ताकत मिलती रही। आज स्थितियां इसके बिलकुल उलट हो गई है। परंपरागत खाद्य सुरक्षा की चीजें आदिवासियों की थाली से पूरी तरह गायब हैं। जंगलों के खत्म होने से कई कंद और औषधियां अब अपना अस्तित्व खो चुके हैं। सरकार ने उसे पट्‌टे के नाम पर छोटे-छोटे जमीन के टुकड़े थमा दिए हैं। जिससे वह इतनी उपज भी नहीं ले पाता कि अपना पेट भर सके।


गंजबासौदा विकासखंड के आमेरा निवासी भूरालाल सहरिया ने बताया कि सरकार ने हमें पट्‌टे पर भले ही जमीन दे दी हो, लेकिन हम उपज इसलिए नहीं ले पाते कि जमीन को नाले के किनारे पर दे दिया गया है। बारिश के दौरान खेतों में पानी भर जाता है और पूरी फसल नष्ट हो जाती है। सिंचाई की सुविधा नहीं होने से गेहूं और चने की फसल नहीं ले पाते। फसल बोते भी हैं तो लागत नहीं निकलती है। समुदाय के कई लोगों ने तो इस परेशानी को देखते हुए जमीन को ठेके पर देना शुरू कर दिया है। इससे नकद पैसा मिल जाता है, जिससे हम लोग घर-गृहस्थी का सामान खरीद लेते हैं। खेतों में मजदूरी से ही आजीविका चलती है।


खदानों के बंद होने से हुए बेरोजगार :

शिवलाल सहरिया ने बताया कि समुदाय के लोग तीन महीने से बेरोजगार हैं। यहां पत्थरों की खदानों में काम करके रोजाना करीब 150 रुपए कमा लेते थे, लेकिन पिछले दिनों झाबुआ जिले के पेटलावद में हुए विस्फोट के बाद क्षेत्र की सभी खदानें बंद हो गई है। खेतों में भी इतना काम नहीं मिलता कि परिवार का पेट भर सकें। अब आजीविका के लिए विस्थापन के अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचा है। गौरतलब है कि गंजबासौदा विकासखंड में उदयपुर क्षेत्र के सहरिया बहुल्य 25 गांवों में करीब सात हजार मजदूर पत्थरों की खदानों में काम करते थे, जो अब बेरोजगार हो गए हैं।


परंपरागत उपचार में अधिक विश्वास :

सहरिया वन औषधियों के अच्छे जानकार माने जाते हैं। वे आज भी सुदूर वनांचलों में अपने परंपरागत तरीकों से ही उपचार करते हैं। खोंगरा के 70 वर्षीय काशीराम सहरिया बताते हैं कि वे मशेर फली, लाफर फेंदा, अमरवेल, सदामस्ती, गुड़बेल, दुधई, नाय, मोरपंख, चेंच,किरवारे की केस, कनउउआ, छोटी नौरी, अचार गुठली, बेकल का पत्ता, पोमार की मुगदार आदि का उपयोग प्राथमिक उपचार के लिए करते हैं। लेकिन इलाज की विधि वैज्ञानिक नहीं होने और अंधविश्वास हावी होने के कारण कई बार लापरवाही की वजह से गंभीर बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। समुदाय के बुजुर्ग आज भी अस्पताल के इलाज पर भरोसा न कर समुदाय के गुनिया पर ही विश्वास करते हैं, लेकिन युवा पीढ़ी ने परंपरागत उपचार के मिथक को तोड़कर अस्पतालों में इलाज और टीकाकरण में रूचि लेना शुरू कर दिया है।
बारिश में सबसे ज्यादा परेशानी :

ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल के 10 से 15 किलोमीटर के दायरे में आने वाले लोगों में आंगनबाड़ी और एएनएम की वजह से जागरूकता आने लगी है। महिलाओं के प्रसव भी अस्पतालों में होने लगे हैं, जन्म के तत्काल बाद बच्चे को मां का दूध भी मिलने लगा है। इससे मातृ शिशु मृत्यु दर में कभी भी आई है, लेकिन सुदूर वनांचलों में आज भी हालात जस के तस हैं, वहां दायियों (बसौड़ जाति की महिलाओं) द्वारा ही प्रसव कराया जाता है, जो कई बार असुरक्षित होता है। पोषण आहार और टीकाकरण की सुविधा भी कई बार उन्हें उपलब्ध नहीं हो पाती। इस समस्या के लिए आवागमन की सुविधा नहीं होना, अस्पताल की दूरी सबसे बड़ी दिक्कत हैं। बारिश के दिनों में तो यह दिक्कत गंभीर रूप ले लेती है।

नहीं मिलता पर्याप्त पोषण :

कहा जाता है कि सहरिया आदिवासियों में बड़े व्यक्ति की मौत टीबी और बच्चों की मौत कुपोषण की वजह से होती है। इसका कारण खाद्य असुरक्षा है। हालांकि बच्चों और गर्भवती महिलाओं में इसका होना सबसे ज्यादा चिंता का विषय है। गर्भावस्था के प्रारंभिक दिनों में महिला को उसकी जरूरत का भोजन और पोषण नहीं मिले तो नवजात शिशु कुपोषित हो सकता है। इसी तरह शिशु के जन्म के तत्काल बाद से छह माह तक सिर्फ मां का दूध और फिर छह माह की उम्र तक पर्याप्त पूरक आहार नहीं मिले तो उसके कुपोषित होने की आशंका बढ़ जाती है। डब्ल्यूएचओ ग्लोबल हेल्थ ऑब्जर्वेटरी के मुताबिक बच्चों में मौत का कारण 35 प्रतिशत कुपोषण है। इसके अलावा निमोनिया 18 प्रतिशत, नवजात मृत्यु 35 प्रतिशत, डायरिया 11 प्रतिशत, खसरा 1 प्रतिशत, एड्स 2 प्रतिशत, मलेरिया 7 प्रतिशत, चोट 5 प्रतिशत और अन्य परिस्थितियां 16 प्रतिशत हैं।

युवा अवस्था में ही बुढ़ापा हावी :

खाद्य असुरक्षा का प्रभाव बड़े-बुजुर्गों में भी देखने को मिलता है। पत्थर की खदानों में काम करने से युवा अवस्था में ही बुढ़ापा हावी होने लगता है। यहां पूरे क्षेत्र में करीब सात हजार मजदूर खदानों में काम करते हैं। लमनिया के 40 वर्षीय भगवान सिंह सहरिया ने बताया कि पिछले 25 साल से खदानों में काम कर रहा हूं। सांस लेने पर पत्थरों की धूल नाक और मुहं में चली जाती है। पत्थरों को तोड़ने के लिए घन चलाना पड़ता है। इससे छाती में ताकत पड़ती है। समय पर न तो खाना खाते हैं और न ही अतिरिक्त पोषण के रूप में कुछ मिलता और लगातार फेफड़ों में धूल के जमा होने से टीबी सहित कई संक्रामक बीमारियों का शिकार होना पड़ रह है। विकासखंड के सहरिया बहुल्य 25 गांवों में अगस्त 2013 से जनवरी 2015 के दौरान टीबी के मरीजों में 165पुरुष और 39 महिलाओं में टीबी की पुष्टि हुई। जिसमें 104 पुरुष और 20 महिलाओं को उपचार मिला। वहीं, 25पुरुष और 09 महिलाओं की मौत हो गई।

कोई टिप्पणी नहीं: